शुक्रवार, 5 जून 2009

दुष्यंत कुमार की गजल

  • हो गई है पीर
    पर्वत सी पिघलनी चाहिए अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी
    चाहिए
    इस नुमाइश में
    मिला वह चीथड़े पहने हुएमैंने पूछा कौन, तो बोला कि
    हिंदुस्तान हूँ.
    यहाँ तक
    आते-आते सूख जाती है कई नदियाँहमें मालूम है पानी कहाँ
    ठहरा हुआ होगा
    कहाँ
    तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिएकहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं
    शहर के लिए