बुधवार, 24 दिसंबर 2008

एक ख़त बीत रहे साल के नाम

२००८ बीत रहा रहा है। बीतना सुखद तो नहीं। दुखद ही कहा जाए। हर जगह आशांति और दुःख का वातावरण कायम है। बात दिल्ली बम कांड की हो या फिर मुंबई की। मुंबई में राज ठाकरे के आतंक से लोगबाग अलग परेशान है। खासकर बिहार और उत्तरप्रदेश के लोग। वैसे कहा जाए तो पूरे हिन्दी भाषी समूह के लिए राज ठाकरे एक अलग खतरा है। और कही तो नहीं कम से कम मुंबई तो जरुर। शेयर बाज़ार एक अलग तबाही मचा रही है। मतलब की हर जगह दुःख ही दुःख। फ़िल्म जगत में भी कोई खास हलचल नहीं।

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

एक ख़त बंद भी और खुला भी

इन दिनों लिखना मुश्किल भरा काम है । परिकथा पत्रिका में छपी मेरी कहानी ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है। यूनिवर्सिटी में होने वाली पॉलिटिक्स को आधार बनाकर मैंने यह कहानी लिखी तो मेरे यूनिवर्सिटी के कुछ लोगों को इस कहानी में अपना चेहरा नज़र आने लगा। सवाल उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों ? क्या यूनिवर्सिटी के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में आवाज उठाना ग़लत है ? कोई है जो यह कहे कि मैंने ग़लत किया है।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

pyari Aru k liye

maine pyar kiya tumse
kuch is tarah
jaise chand pyar karta hai chandni se,
jaise hawa pyar karti hai tufano se,
jaise machli pyar karti hai jal se,

अरु

tum phool ho
hawa ho,
kanta ho,
nadi ho,
jangal,
tum sab kuch ho,
lekin sabse pahle tum
mere dil ki dharkan ho.