सोमवार, 15 दिसंबर 2008

एक ख़त बंद भी और खुला भी

इन दिनों लिखना मुश्किल भरा काम है । परिकथा पत्रिका में छपी मेरी कहानी ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है। यूनिवर्सिटी में होने वाली पॉलिटिक्स को आधार बनाकर मैंने यह कहानी लिखी तो मेरे यूनिवर्सिटी के कुछ लोगों को इस कहानी में अपना चेहरा नज़र आने लगा। सवाल उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों ? क्या यूनिवर्सिटी के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में आवाज उठाना ग़लत है ? कोई है जो यह कहे कि मैंने ग़लत किया है।

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