गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009
ब्लॉग से साभार
Saturday, 27 September 2008 05:00 B4M भड़ास4मीडिया - प्रिंट मीडिया
भारतीय भाषा परिषद के नए निदेशक और संपादक की तलाश पूरी हो गई है। दौड़ में आगे चल रहे हरीश पाठक को पटखनी देते हुए विजय बहादुर सिंह 'किंग' बन गए है। वे 22 या 23 अक्टूबर को कोलकाता में कार्यभार ग्रहण करेंगे। इस संस्था की चर्चित पत्रिका वागर्थ में संपादक के रूप में विजय बहादुर सिंह का नाम जनवरी से जाएगा। दिसंबर तक कुसुम खेमानी और एकांत श्रीवास्तव ही इसके संपादक रहेंगे। कुसुम खेमानी भारतीय भाषा परिषद की सचिव हैं। वे इस संस्था की मालकिन भी हैं। साहित्यकार एकांत श्रीवास्तव केंद्र सरकार में सेवारत होने के नाते अंशकालिक संपादक के रूप में मैग्जीन से जुड़े हैं। एकांत ने वागर्थ से इस्तीफे का नोटिस दे रखा है। वे दिसंबर माह में कार्यमुक्त हो जाएंगे।
रवींद्र कालिया के ज्ञानपीठ में जाने के चलते भारतीय भाषा परिषद के निदेशक का पद खाली चल रहा था। तभी से परिषद का प्रवर मंडल नए निदेशक की तलाश में था। प्रवर मंडल में केदारनाथ सिंह, सुनील गंगोपाध्याय, इंदुनाथ चौधरी, डी जयकांतन जैसे दिग्गज साहित्यकार हैं। सूत्रों का कहना है कि प्रवर मंडल इस बार निदेशक और संपादक के रूप में अपेक्षाकृत युवा और तेज तर्रार व्यक्ति को लाना चाहता था, जो साहित्य-पत्रकारिता का लंबा अनुभव रखता हो। पहला नाम आया चित्रा मुदगल का। चित्रा ने अपनी विवशता और व्यस्तता बताकर निदेशक बनने से इनकार कर दिया। विवशता ये कि वे दिल्ली से बाहर नहीं जाना चाहती। उन्हें निदेशक के रूप में कोलकाता में काम करना पड़ता। व्यस्तता ये कि वो हिंदी की बड़ी लेखिका होने के साथ कई पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी निभा रहीं हैं, जिससे अलग हो पाना उनके लिए मुश्किल था। चित्रा मुदगल और परिषद के पूर्व निदेशक प्रभाकर श्रोत्रिय ने नए निदेशक और संपादक के लिए हरीश पाठक का नाम सुझाया। 30 वर्षों से साहित्य व पत्रकारिता में सक्रिय हरीश पाठक कई बड़े अखबारों और मैग्जीनों के संपादक रह चुके हैं। हरीश पाठक से कई दौर की बातचीत के बाद उनका निदेशक बनना तय माना जा रहा था। पर इसी बीच समीकरण बदलने लगे।
साहित्य के दिग्गजों की तरफ से नए मोहरे मैदान में लाए जाने लगे। विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन की तरफ से रविभूषण और हिंदी के विद्वान कमला प्रसाद पांडेय व अन्य की ओर से विजय बहादुर सिंह का नाम नए निदेशक और संपादक के रूप में प्रवर मंडल के आगे पेश किया गया। बताते हैं कि वागर्थ के अंशकालिक संपादक के पद से इस्तीफा देने के बाद एकांत शांत नहीं बैठे। वे गुपचुप रूप से सक्रिय रहे। सूत्रों का कहना है कि परिषद की सचिव कुसुम खेमानी के करीबी एकांत ने अपने गुरु विजय बहादुर सिंह की पैरवी की। कुसुम खेमानी के चलते अंततः विजय बहादुर सिंह 'किंग' बन गए। प्रवर मंडल के ज्यादातर सदस्यों में हरीश पाठक के नाम पर बनी सहमति परवान न चढ़ सकी। सूत्रों का कहना है कि विजय बहादुर सिंह के अधीन ही एकांत श्रीवास्तव ने विदिशा से पीएचडी की है और एक तरह से उन्होंने अपने गुरु को निदेशक बनवाकर गुरु ऋण से उऋण होने का दायित्व निभाया।
परिषद की सचिव कुसुम खेमानी ने भड़ास4मीडिया को बताया कि विजय बहादुर जी जैसा प्रतिष्ठित विद्वान नए निदेशक के रूप में नियुक्त किए गए हैं। उनके नेतृत्व में वागर्थ में काम होगा। कुसुम ने कहा कि अभी तक निदेशक ही संपादक के रूप में काम देखते रहे हैं, इसलिए विजय बहादुर जी से आग्रह किया गया है कि वे भी इस परंपरा को आगे बढ़ाएं। वे जब कोलकाता आ जाएंगे तो जैसा भी कहेंगे, वैसा किया जाएगा।
साहित्यकार एकांत श्रीवास्तव ने भड़ास4मीडिया को बताया कि कुसुम जी और वे दिसंबर तक मैग्जीन के संपादक के रूप में काम देखेंगे। जनवरी से मैग्जीन के संपादक विजय बहादुर सिंह हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि यह केवल संयोग मात्र है कि जिन्हें निदेशक चुना गया, वे उनके गुरु रहे हैं। उन्होंने विजय बहादुर को निदेशक बनवाने में खुद की सक्रिय भूमिका से इनकार किया।
वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हरीश पाठक का कहना है कि उन्हें विजय बहादुर सिंह को नया निदेशक और संपादक बनाए जाने के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। यह पूछे जाने पर कि क्या आप निदेशक पद की दौड़ में थे और आपको पटखनी मिली, उनका कहना था कि इस बारे में उन्हें कुछ नहीं कहना। उन्हें लिखित रूप से अभी तक कुछ भी नहीं बताया गया है इसलिए वे पूरे मामले पर कुछ भी नहीं कहना चाहते।
नोट : यह साभार सामग्री है .
शनिवार, 22 अगस्त 2009
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
गालिब की शायरी
देह्र में नक़्श-ए-वफ़ा, वजहे तसल्ली न हुआहै ये वो लफ़्ज़ जो शर्मिन्दा-ए-मानी न हुआ इस दुनिया में वफ़ा एक बेमाअनी लफ़्ज़ है। वफ़ा के नक़्श से ज़माने में किसी को तसल्ली न हुई। वफ़ा एक ऎसा लफ़्ज़ है जिसे अपने मफ़हूम से कभी शर्म न आई।सबज़ा-ए-ख़त से तेरा काकुल-ए-सरकश न दबाये ज़मर्रुद की हरीफ़-ए-दम-ए-अफ़ई न हुआ ज़मर्रुद के सामने साँप अंधा हो जाता है लेकिन काकुल के ज़हरीले साँपों पर ज़मर्रुद यानी सबज़ा-ए-ख़त का भी कोई असर नहीं हुआ। मक़सद ये के सबज़ा-ए-ख़त के नमूदार होने पर भी तेरे बालों की ज़हर अफ़शानी का वही आलम है। मैंने चाहा था के अंदोहे-वफ़ा से छूटूँ वो सितमगर मेरे मरने पे भी राज़ी न हुआ मोहब्बत के ग़म से निजात हासिल करने के लिए मैंने मरना चाहा था लेकिन ज़ालिम महबूब मेरी मौत के लिए भी रज़ामन्द न हुआ। क्योंके मुझ जैसा वफ़ा करने वाला आशिक़ कोई और नज़र नहीं आ रहा था।दिल गुज़रगाहे ख़्याल-ए-म-ओ-साग़र ही सही गर नफ़स जादा-ए-सर मंज़िल-ए-तक़वा न हुआ मैं परहेज़गार और पारसा अगर नहीं हूँ, न सही। मेरा दिल जाम-ओ-शराब की गुज़रगाह तो है।हूँ तेरे वादा न करने पे भी राज़ी के कभी गोश मिन्नत कशे गुलबांग-ए-तसल्ली न हुआ मुझे ख़ुशी है के मेरे मेहबूब ने मिलने का वादा नहीं किया और मेरे कानों ने तसल्ली देने वाली ख़ुशगवार आवाज़ का एहसान नहीं उठाया। किससे मेहरूमिए क़िसमत की शिकायत कीजे हमने चाहा था के मर जाएँ सो वो भी न हुआ हमारी क़िस्मत भी अजीब है। हमें हर काम में मेहरूमी नसीब हो रही है, यहाँ तक के हमने मरना चाहा तो मर भी न सके, अब इस की शिकायत किससे करें। मर गया सदमा-ए-यक जुम्बिश-ए-लब से ग़ालिब नातवानी से हरीफ़-ए-दम-ए-ईसा न हुआ ईसा की तरह मेहबूब भी मेरे अन्दर नई ज़िन्दगी फूँकने आया था। लेकिन मेरी नातवानी का ये आलम था के मैंने होंटों को जुम्बिश ही दी थी के मैं उस जुम्बिश के सदमे से चल बसा और मैं मेहबूब के एहसान से बच गया।
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
कर्मवीर
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहींरह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहींकाम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नहींभीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहींहो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भलेसब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।आज करना है जिसे करते उसे हैं आज हीसोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वहीमानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कहीजो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप हीभूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहींकौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहींकाम करने की जगह बातें बनाते हैं नहींआज कल करते हुये जो दिन गंवाते हैं नहींयत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहींबात है वह कौन जो होती नहीं उनके लियेवे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये ।व्योम को छूते हुये दुर्गम पहाड़ों के शिखरवे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहरगर्जते जल-राशि की उठती हुयी ऊँची लहरआग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपटये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहींभूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,बात इतनी है कि कोई पुल बना हैरक्त वर्षों से नसों में खौलता है,आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,आजकल नेपथ्य में संभावना है ।
दुष्यन्त कुमार की रचना
बुधवार, 12 अगस्त 2009
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये
वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब
वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये
सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़र
ताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये
वो मेवा हाये ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाह
वो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाये हाये
सोमवार, 10 अगस्त 2009
निर्माता : ढिलिन मेहता
निर्देशक : सोहम शाह
संगीत : सलीम-सुलैमान
कलाकार : संजय दत्त, इमरान खान, श्रुति हासन, मिथुन चक्रवर्ती, डैनी, रवि किशन, रति अग्निहोत्री, चित्रांशी
रेटिंग : 2/5
जिस तरह टीवी पर ‘बिग बॉस’ नुमा कुछ रियलिटी शो दिखाए जाते हैं, जिनमें लोगों को टॉस्क दिए जाते हैं और कौन शो में रहेगा कौन नहीं, इसका फैसला दर्शक करते हैं, उसी तरह का शो ‘लक’ फिल्म का मूसा भी आयोजित करता है। फर्क इतना है कि उसके खेल में भाग लेने वाले एक-एक कर मारे जाते हैं और जो भाग्यशाली होते हैं वो बच जाते हैं।
मूसा ‘लक’ का व्यापार करता है और भाग्यशाली लोगों को वो उठाकर अपने खेल का हिस्सा बना लेता है। लोग इस बात पर पैसा लगाते हैं कि कौन जिंदा बचेगा। मूसा लोगों की किस्मत से तरह-तरह से खेलता है।
हेलिकॉप्टर में वह सभी को बैठाकर हजारों फीट ऊपर ले जाता है और कूदने को कहता है। तीन पैराशूट ऐसे हैं, जो खुलेंगे नहीं। बदकिस्मत मारे जाते हैं और किस्मत वाले बच जाते हैं। जो बचे वे अगले राउंड में फिर जिंदगी और मौत के खेल में अपना लक आजमाते हैं।
निर्देशक और लेखक सोहम की कहानी का मूल विचार अच्छा है। उसमें नयापन है। वे टीवी पर दिखाने वाले शो को फिल्म में ले आए और उसे लार्जर देन लाइफ का रूप दे दिया, लेकिन कहानी का वे ठीक से विस्तार नहीं कर पाए वरना एक अच्छी फिल्म बनाई जा सकती थी।
PRमूसा (संजय दत्त) गैंबलिंग की दुनिया में बड़ा नाम है। लाखन (डैनी) उसके लिए दुनियाभर से भाग्यशाली लोगों को चुनने का काम करता है, जो उसके खेल का हिस्सा बनते हैं। सवाल यह है कि इसमें भाग्यशाली लोगों को चुनने की क्या जरूरत। किसी को भी चुना जा सकता है।
राम (इमरान खान), शॉर्टकट (चित्रांशी), मेजर (मिथुन चक्रवर्ती), एक कैदी (रवि किशन) और नताशा (श्रुति हासन) अलग-अलग कारणों से मूसा के खेल का हिस्सा हैं। ये कुछ लोगों के साथ अपना ‘लक’ आजमाते हैं।
ट्रेन सीक्वेंस के साथ फिल्म की बेहतरीन शुरुआत होती है। नए-नए किरदार कहानी में जुड़ते जाते हैं और कहानी आगे बढ़ती है। उम्मीद बँधती है कि एक अच्छी फिल्म देखने को मिलेगी, लेकिन जल्दी ही फिल्म अपनी दिशा खो बैठती है। मूसा इन लोगों के साथ जिंदगी और मौत के जो खेल खेलता है, वो इतने दिलचस्प नहीं हैं कि दर्शकों को बाँधकर रखें। एकरसता होने की वजह से फिल्म ठहरी हुई लगती है। रोमांस और इमोशन पैदा करने की कोशिश की गई है, लेकिन वो जबरदस्ती ठूँसे हुए और बनावटी लगते हैं।
फिल्म का अंत भी हास्यास्पद है। मूसा की अंतिम चुनौती में विजयी होकर राम 20 करोड़ रुपए जीत जाता है। इसके बावजूद वो मूसा के साथ एक और खेल खेलता है। क्यों? इसका कोई जवाब नहीं है। दोनों एक-दूसरे को गोली मार देते हैं। इसके बाद अस्पताल वाले दृश्य देखकर लेखकों की अक्ल पर हँसी आती है। श्रुति हासन के डबल रोल वाली बात का भी कोई मतलब नहीं है।
निर्देशक सोहम का सारा ध्यान फिल्म को स्टाइलिश लुक देने में रहा और इसमें कुछ हद तक वे कामयाब रहे। आँख पर पट्टी बाँधे 6 ट्रेनों के बीच पटरी पार करना, पानी के अंदर शार्क वाले दृश्य और अंत में ट्रेन वाला दृश्य अच्छे बन पड़े हैं।
मूसा जैसा रोल निभाने में संजय दत्त माहिर हैं। एक बार फिर कामयाब रहे हैं। इमरान खान के चेहरे पर पूरी फिल्म में एक जैसे भाव रहे हैं। चाहे वो माँ से बात कर रहे हों या प्रेमिका से या अपने दुश्मन से। मिथुन चक्रवर्ती ठीक-ठाक रहे।
PRकलाकारों की भीड़ में रवि किशन और चित्रांशी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहे। श्रुति हासन ने अपना करियर शुरू करने के लिए गलत फिल्म का चयन किया है। उन्हें ज्यादा अवसर नहीं मिले। अभिनय भी उनका औसत दर्जे का रहा। डैनी प्रभावी रहे।
तकनीकी रूप से फिल्म सशक्त है और स्टंट सीन उल्लेखनीय हैं। संगीतकार के रूप में सलीम-सुलैमान निराश करते हैं। कुल मिलाकर ‘लक’ में कुछ रोमांचक दृश्य हैं, थोड़ा नयापन है, लेकिन पूरी फिल्म के रूप में ये निराश करती है।
लव आजकल फ़िल्म
खेलने वाले को फिल्म के मुख्य किरदार सैफ अली या ऋषि कपूर में से एक को चुनना होता है। चुने हुए पात्र को कई चीजों को एकत्रित करना पड़ता है ताकि वो अपनी प्रेमिका दीपिका पादुकोण या नीतू सिंह को प्रभावित कर सके।
भारत में इंटरनेट, मोबाइल के बढ़ते हुए यूजर्स और सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए हंगामा डिजिटल मीडिया, तीन डिजिटल स्क्रीन्स (मोबाइल, इंटरनेट और डीटीएच) पर फिल्म को प्रमोट कर रही है।
इस बारे में हंगामा डिजिटल मीडिया के मैनेजिंग डॉयरेक्टर और सीईओ नीरज रॉय कहते हैं ‘भारत में इंटरनेट और मोबाइल का प्रयोग करने वालों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। यही नहीं लोग चाहते हैं कि टीवी के जरिये भी उनकी इच्छा पूरी हो। इसको ध्यान में रखते हुए हंगामा फिल्म के मामले में उन्हें अपनी सेवाएँ देती हैं।‘
‘लव आज कल’ के निर्माता दिनेश विजन और सैफ अली का कहना है ‘हमारी फिल्म का प्रचार हम पूरी दुनिया में करना चाहते हैं और डिजिटल मीडिया ने हमारी इस ख्वाहिश को पूरा किया। आज का युवा तीन डिजिटल स्क्रीन्स में से कम से कम एक से तो जुड़ा हुआ है और इसका हमें पूरा लाभ मिलेगा क्योंकि हमारी फिल्म भी युवाओं के बारे में बात करती है।‘
‘लव आज कल’ प्यार के बारे में दो पीढि़यों के नजरिये को पेश करती है। इस थीम को सोशल नेटवर्किंग पर दर्शाया गया है। साथ ही ‘लव आज कल आइस ब्रेकर’ प्रतियोगिता का आयोजन भी प्रमुख सोशल नेटवर्किंग साइट पर किया जा रहा है।
शनिवार, 8 अगस्त 2009
जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सडा पानी पिलाए देती है !गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी । जरुर कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा ? दूर से लोग डॉँट बताऍगे । साहू का कुऑं गॉँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहॉं कौन पानी भरने देगा ? कोई कुऑं गॉँव में नहीं है। जोखू कई दिन से बीमार हैं । कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं ।गंगी ने पानी न दिया । खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली-यह पानी कैसे पियोंगे ? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुऍ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ। जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहॉ से लाएगी ?ठाकुर और साहू के दो कुऍं तो हैं। क्यो एक लोटा पानी न भरन देंगे? ‘हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें । गराबी का दर्द कौन समझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झॉँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें ?’इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।2रात के नौ बजे थे । थके-मॉँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पॉँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में । बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास मॉँगता, कोई सौ। यहॉ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी । काम करने ढ़ग चाहिए ।इसी समय गंगी कुऍ से पानी लेने पहुँची ।कुप्पी की धुँधली रोशनी कुऍं पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी । इस कुँए का पानी सारा गॉंव पीता हैं । किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते । गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं ? इसलिए किये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहॉ तो जितने है, एक-से-एक छॅटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है । किस-किस बात मे हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे । कभी गॉँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर सॉँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!कुऍं पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी । कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए मे जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं ?कुऍं पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी । इनमें बात हो रही थीं । ‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं । घड़े के लिए पैसे नहीं है।’हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं ।’‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।’‘लौडिंयॉँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौडियॉं कैसी होती हैं!’‘मत लजाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को ती तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता ।’दानों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुऍं की जगत के पास आयी । बेफिक्रे चले गऐ थें । ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर ऑंगन में सोने जा रहे थें । गंगी ने क्षणिक सुख की सॉस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पॉँव कुऍं की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दाऍं-बाऍं चौकनी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो । अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया ।घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा-सी आवाज न हुई । गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे ।घड़ा कुऍं के मुँह तक आ पहुँचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींसच सकता था। गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा। गंगी के हाथ रस्सी छूट गई । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं । ठाकुर कौन है, कौन है ? पुकारते हुए कुऍं की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी । घर पहुँचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी रहा है।
तीन कविताएं
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रघुवीर सहाय
अखबारवाला
धधकती धूप में रामू खड़ा है
खड़ा भुलभल में बदलता पांव रह रह
बेचता अखबार जिसमें बड़े सौदे हो रहे हैं।
एक प्रति पर पांच पैसे कमीशन है,
और कम पर भी उसे वह बेच सकता है
अगर हम तरस खायें, पांच रूपये दें
अगर खैरात वह ले ले।
लगी पूंजी हमारी है छपाई-कल हमारी है
खबर हमको पता है, हमारा आतंक है,
हमने बनायी है
यहां चलती सड़क पर इस खबर को हम खरीदें क्यों ?
कमाई पांच दस अखबार भर की क्यों न जाने दैं ?
वहां जब छांह में रामू दुआएं दे रहा होगा
खबर वातानुकूलित कक्ष में तय कर रही होगी
करेगा कौन रामू के तल की भूमि पर कब्जा।
खोज खबर
अनजाने व्यक्ति ने जान पर खेल कर
लोगों के सामने चेहरा दिखला दिया
जिसने आवाज दी हत्यारा वह है- जाने न पाये वह
उसे अब छिपा दिया गया है
वह अपनी एकाकी गरिमा में प्रकट हुआ एक मिनट के लिए
प्रकट हुआ और फिर हम सबसे अलग कर दिया गया
अपराध संगठित, राजनीति संगठित, दमनतंत्र संगठित
केवल अपराध के विरूद्ध जो कि बोला था अकेला है
उसने कहा है कि हमसे संपर्क करे, गुप्त रहे
हमें उसे पुरस्कार देना है और पुरस्कार को गुप्त नहीं रखेंगे।
मुझसे कहा है कि मृत्यु की खबर लिखो :
मुर्दे के घर नहीं जाओ, मरघट जाओ
लाश को भुगताने के नियम, खर्च और कुप्रबंध
खोज खबर लिख लाओ :
यह तुमने क्या लिखा- ‘झुर्रियां, उनके भीतर छिपे उनके
प्रकट होने के आसार,
-आंखों में उदासी सी एक चीज दिखती है-’
यह तुमने मरने के पहले का वृतांत क्यों लिखा ?
नई हंसी
महासंघ का मोटा अध्यक्ष
धरा हुआ गद्दी पर खुजलाता है उपस्थ
सर नहीं,
हर सवाल का उत्तर देने से पेश्तर
बीस बड़े अखबारों के प्रतिनिधि पूछें पचीस बार
क्या हुआ समाजवाद
कहें महासंघपति पचीस बार हम करेंगे विचार
आंख मारकर पचीस बार वह, हंसे वह, पचीस बार
हंसें बीच अखबार
एक नयी ही तरह की हंसी यह है
पहले भारत में सामूहिक हास परिहास तो नहीं ही था।
जो आंख से आंख मिला हंस लेते थे
इसमें सब लोग दायें-बायें झांकते हैं
और यह मुंह फाड़कर हंसी जाती है।
राष्ट्र को महासंघ का यह संदेश है
जब मिलो तिवारी से – हंसो - क्योंकि तुम भी तिवारी हो
जब मिलो शर्मा से – हंसो - क्योंकि वह भी तिवारी है
जब मिलो मुसद्दी से
खिसियाओ
जांतपांत से परे
रिश्ता अटूट है
राष्ट्रीय झेंप का ।
गुरुवार, 6 अगस्त 2009
प्रेमचंद की कहानी : ईदगाह
रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गॉंव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयां खाऍंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी ऑंखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर काधन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहनसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या।और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और मॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे। अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हे। हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी, तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहॉँ से उतने पैसे निकालेंगे।अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर चली जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने के क्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितबन उसका विध्वसं कर देगी।हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।अमीना का दिल कचोट रहा है। गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाऍंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँ सेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहॉँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे। मॉँगे का ही तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पेसे मिले थे। उस उठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटुवें में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा पर लगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी। सभी को सेवेयॉँ चाहिए और थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं। जिन्दगी खैरियत से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट जाऍंगे।गॉँव से मेला चला। ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियॉँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता हे। माली अंदर से गाली देता हुआ निंलता है। लड़के वहाँ से एक फलॉँग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को केसा उल्लू बनाया है।बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं जाने देते। और वहॉँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्मॉँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढ़क जाऍं।महमूद ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम। मोहसिन बोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं। जरा-सा बैट पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपने लगेंगे! सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ जाए। महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं।मोहसिन—हॉँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्मॉँ इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें न पा सका, सच।आगे चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयॉँ कौन खाता? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूपये देता है, बिल्कुल ऐसे ही रूपये।हामिद को यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को कहॉँ से मिल जाऍंगी?मोहसिन ने कहा—जिन्नात को रूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाऍं। लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए। अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाऍं।हामिद ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए।हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ।मोहसिन—अब यह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देगें। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरन्त बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है।आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो जाऍं। मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास इतने रूपये आते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाऍं। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन पकड़ेगा! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई। सारी लेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए। हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?अब बस्ती घनी होने लगी। ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी। एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-तॉँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से आर्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।सहसा ईदगाह नजर आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया हे। नाचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम ढिछा हुआ है। और रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जाने कहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहॉँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हे। यहॉँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हें। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती हे, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं। 2नमाज खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला हें एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं। एक पेसा देकर बैठ जाओं और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते हें। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। अधर दूकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्ती और धोबिन और साधु। वह! कत्ते सुन्दर खिलोने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी अड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम हे। कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे है। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह केसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के!मोहसिन कहता है—मेरा भिश्ती रोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरेमहमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा।नूरे—ओर मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।सम्मी—ओर मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।हामिद खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं, लेकिन ललचाई हुई ऑंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हें, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचता रह जाता है।खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबक ओर देखता है।मोहसिन कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!हामिद को सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद हें मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।मोहसिन—अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा।हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं है?सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगें?महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है।हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयॉँ लिखी हैं।मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पररूक जात हे। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तबे से रोटियॉँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे। चिमटा कितने काम की चीज है। रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्मॉँ बेचारी को कहॉँ फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज हाथ जला लेती हैं।हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कतने लालची हैं। इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करों। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाऍं मिठाइयॉँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हें। मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों का दुआऍं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। में भी इनसे मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते। आखिर अब्बाजान कभीं न कभी आऍंगे। अम्मा भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा हूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हंसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी!‘बिकाऊ है कि नहीं?’‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?’तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’‘छ: पैसे लगेंगे।‘हामिद का दिल बैठ गया।‘ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।‘हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?यह कहता हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियॉँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते हैं!मोहसिन ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की।महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?हामिद—खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे काकाम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर सकतें मेरा बहादुर शेर है चिमटा।सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हें, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी हो रही हे। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रर्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।मोहसिन ने एड़ी—चोटी का जारे लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता? हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो अदालम में बॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेगे।हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?नूरे ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला।हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगें क्या बेचारे!मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा। उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लैडियों की तरह घर में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।महमूद ने एक जोर लगाया—वकील साहब कुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?इस तर्क ने सम्मी औरनूरे को भी सजी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही हे पट्ठे ने! चिमटा बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।बात कुछ बनी नही। खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट में डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज हे। उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती हे। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द हे। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।विजेता को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?संधि की शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमार भिश्ती लेकर देखो।महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।हामिद को इन शर्तो को मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं।हामिद ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले।लेकिन मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?महमूद—दुआ को लिय फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रूस्तमें—हिन्द हे ओर सभी खिलौनों का बादशाह।रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दियें। महमून ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद थां। 3ग्यारह बजे गॉँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियॉं भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों खुब रोए। उसकी अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉँटे और लगाए।मियॉँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर हो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिदाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। आदालतों में खर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हें। क्या यहॉँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरे हवा करने लगें मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हें। मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जावब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टॉँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहों, कर सकते हो। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।अब मियॉँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।‘यह चिमटा कहॉं था?’‘मैंने मोल लिया है।‘‘कै पैसे में?‘तीन पैसे दिये।‘अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?’हामिद ने अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद कें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!
बुधवार, 5 अगस्त 2009
चिडि़या को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहॉं हवा में उन्हें
अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहॉं चुग्गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है।
फिर भी चिडि़या
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।
मंगलवार, 4 अगस्त 2009
मंगलेश डबराल की
एक कविता
त्वचा
त्वचा ही इन दिनों दिखती है चारों ओर
त्वचामय बदन त्वचामय सामान
त्वचा का बना कुल जहान
टीवी रात-दिन दिखलाता है जिसके चलते-फिरते दृश्य
त्वचा पर न्योछावर सब कुछ
कई तरह के लेप उबटन झाग तौलिए आसमान से गिरते हुए
कमनीय त्वचा का आदान-प्रदान करते दिखते हैं स्त्री-पुरुष
प्रेम की एक परत का नाम है प्रेम
अध्यात्म की खाल जैसा अध्यात्म
सतह ही सतह फैली है हर जगह उस पर नए-नए चमत्कार
एक सुंदर सतह के नीचे आसानी से छुप जाता है एक कुरूप विचार
एक दिव्य त्वचा पहनकर प्रकट होता है मुकुटधारी भगवान
यह कोई और ही त्वचा है
जो जीती-जागती-धड़कती देह में से नहीं उपजती उसकी सुंदरता बनकर
जो सांस नहीं लेती जिसके रोंये नहीं सिहरते
जिसे पीड़ा नहीं महसूस होती
यह कबीर की मुई खाल नहीं है
जिसकी गहरी सांस लोहे को भस्म कर देती है
यह कोई और ही त्वचा है जो कोई पुकार नहीं सुनती
जिसे छूने पर रक्त नहीं उछलता हृदय नहीं पसीजता
सतह पर पड़ा रहता है दुख
झुर्रियों के समुद्र में विलीन होती जाती मोटी खाल की एक नदी
अपने साथ बहाकर ले जाती है सुगंधमय प्रसाधन तौलिए उबटन
यही है हमारा त्वचामय समय यही है हमारा निवास
इसी पर नाचते हैं हमारे विचार
देखो एक रोगशोकजरामरणविहीन कविता की दशा
वह यहां त्वचा की तरह सूखती हुई पड़ी है ।
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मैंने आहुति बन कर देखा
मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ?कांटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा हैमैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?
मैं कब कहता हूं मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?मैं कब कहता हूं विजय करूं मेरा ऊंचा प्रासाद बने ?या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ?
पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ?नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ?मैं प्रस्तुत हूं चाहे मिट्टी जनपद की धूल बने —फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गतिरोधक शूल बने !
अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है —क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है ?वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला हैवे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है ।
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया —मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !मैं कहता हूं, मैं बढ़ता हूं, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूंकुचला जाकर भी धूली-सा आंधी-सा और उमड़ता हूं ।
मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बनेइस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने !भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने —तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने ।
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किसको नमन करूं मैं
तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं ?
भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है,मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है।जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?
भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है,एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है ।जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है,देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है ।निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं ?
खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से,पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से,तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है,दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है।मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं ?
दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं,मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं,घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन,खोल रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन ।आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं ?
उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है,धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है,तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है,किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है।मानवता के इस ललाट-चंदन को नमन करूँ मैं ?
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काव्य संग्रह ’नील कुसुम’ ( 1954 ) से साभार
शुक्रवार, 5 जून 2009
दुष्यंत कुमार की गजल
- हो गई है पीर
पर्वत सी पिघलनी चाहिए अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी
चाहिए
इस नुमाइश में
मिला वह चीथड़े पहने हुएमैंने पूछा कौन, तो बोला कि
हिंदुस्तान हूँ.
यहाँ तक
आते-आते सूख जाती है कई नदियाँहमें मालूम है पानी कहाँ
ठहरा हुआ होगा
कहाँ
तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिएकहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं
शहर के लिए
