तीन कविताएं
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रघुवीर सहाय
अखबारवाला
धधकती धूप में रामू खड़ा है
खड़ा भुलभल में बदलता पांव रह रह
बेचता अखबार जिसमें बड़े सौदे हो रहे हैं।
एक प्रति पर पांच पैसे कमीशन है,
और कम पर भी उसे वह बेच सकता है
अगर हम तरस खायें, पांच रूपये दें
अगर खैरात वह ले ले।
लगी पूंजी हमारी है छपाई-कल हमारी है
खबर हमको पता है, हमारा आतंक है,
हमने बनायी है
यहां चलती सड़क पर इस खबर को हम खरीदें क्यों ?
कमाई पांच दस अखबार भर की क्यों न जाने दैं ?
वहां जब छांह में रामू दुआएं दे रहा होगा
खबर वातानुकूलित कक्ष में तय कर रही होगी
करेगा कौन रामू के तल की भूमि पर कब्जा।
खोज खबर
अनजाने व्यक्ति ने जान पर खेल कर
लोगों के सामने चेहरा दिखला दिया
जिसने आवाज दी हत्यारा वह है- जाने न पाये वह
उसे अब छिपा दिया गया है
वह अपनी एकाकी गरिमा में प्रकट हुआ एक मिनट के लिए
प्रकट हुआ और फिर हम सबसे अलग कर दिया गया
अपराध संगठित, राजनीति संगठित, दमनतंत्र संगठित
केवल अपराध के विरूद्ध जो कि बोला था अकेला है
उसने कहा है कि हमसे संपर्क करे, गुप्त रहे
हमें उसे पुरस्कार देना है और पुरस्कार को गुप्त नहीं रखेंगे।
मुझसे कहा है कि मृत्यु की खबर लिखो :
मुर्दे के घर नहीं जाओ, मरघट जाओ
लाश को भुगताने के नियम, खर्च और कुप्रबंध
खोज खबर लिख लाओ :
यह तुमने क्या लिखा- ‘झुर्रियां, उनके भीतर छिपे उनके
प्रकट होने के आसार,
-आंखों में उदासी सी एक चीज दिखती है-’
यह तुमने मरने के पहले का वृतांत क्यों लिखा ?
नई हंसी
महासंघ का मोटा अध्यक्ष
धरा हुआ गद्दी पर खुजलाता है उपस्थ
सर नहीं,
हर सवाल का उत्तर देने से पेश्तर
बीस बड़े अखबारों के प्रतिनिधि पूछें पचीस बार
क्या हुआ समाजवाद
कहें महासंघपति पचीस बार हम करेंगे विचार
आंख मारकर पचीस बार वह, हंसे वह, पचीस बार
हंसें बीच अखबार
एक नयी ही तरह की हंसी यह है
पहले भारत में सामूहिक हास परिहास तो नहीं ही था।
जो आंख से आंख मिला हंस लेते थे
इसमें सब लोग दायें-बायें झांकते हैं
और यह मुंह फाड़कर हंसी जाती है।
राष्ट्र को महासंघ का यह संदेश है
जब मिलो तिवारी से – हंसो - क्योंकि तुम भी तिवारी हो
जब मिलो शर्मा से – हंसो - क्योंकि वह भी तिवारी है
जब मिलो मुसद्दी से
खिसियाओ
जांतपांत से परे
रिश्ता अटूट है
राष्ट्रीय झेंप का ।
शनिवार, 8 अगस्त 2009
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