कर्मवीर
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहींरह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहींकाम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नहींभीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहींहो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भलेसब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।आज करना है जिसे करते उसे हैं आज हीसोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वहीमानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कहीजो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप हीभूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहींकौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहींकाम करने की जगह बातें बनाते हैं नहींआज कल करते हुये जो दिन गंवाते हैं नहींयत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहींबात है वह कौन जो होती नहीं उनके लियेवे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये ।व्योम को छूते हुये दुर्गम पहाड़ों के शिखरवे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहरगर्जते जल-राशि की उठती हुयी ऊँची लहरआग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपटये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहींभूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें